जितिया कब है

जितिया कब है यह जानने से पहले हम यह जान लेते हैं कि जितिया क्यों मनाया जाया है ? इस व्रत से जुड़ी पौराणिक कथाओं का भी वर्णन हम इस पोस्ट के जरिये करेंगे। हमारे भारतवर्ष में मनाए जाने वाले सभी पर्वों में कोई न कोई कथा जुड़ी हुई है । इन पर्वों को मनाने के पीछे वैज्ञानिक कारण भी जुड़ा होता है ।

हमारे हिंदू सनातन धर्म में ऋषि-मुनियों को बहुत पहले से ही विज्ञान, आयुर्वेद इत्यादि का ज्ञान था । इस कारण पर्वों के माध्यम से लोगों के बीच विज्ञान तथा आयुर्वेद का लाभ पहुंचाने के लिए उन्होंने नियम बनाएं जिसका पालन करने से बहुत लाभ मिलता है । इस पोस्ट के माध्यम से हम यह समझने की कोशिश करेंगे की जितिया पर्व में वैज्ञानिक दृष्टिकोण से किस प्रकार लाभ प्राप्त होता है । तो आइए इस पोस्ट के माध्यम से जितिया पर्व से जुड़े नियम तथा वैज्ञानिक कारणों को जानते हैं ।

जितिया पर्व क्यों मनाया जाता है

जितिया व्रत
जितिया व्रत

यह व्रत पुत्र के दीर्घायु एवं कुशलता के लिए अश्विन माह में कृष्ण पक्ष के अष्टमी को किया जाता है । इस व्रत में कुछ भी खाया पिया नहीं जाता है यह व्रत निर्जला व्रत है मतलब इसमें पानी तक पीना वर्जित रहता है । यह मां की ममता एवं उनका अपने बच्चों के प्रति प्यार ही है कि इतने कठिन व्रत को भी वे बहुत ही सहजता से कर लेती हैं ।

इस व्रत के नियम कठिन बनाए गए हैं यह एक तरह से व्रत धारियों के कष्ट सहने की परीक्षा भी है । यह व्रत मुख्यता उत्तर भारत में जैसे बिहार, झारखंड उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में प्रमुख रूप से मनाया जाता है । अन्य भागों में जितिया को दूसरे नाम से जाना जाता है एवं इसके नियम भी अलग होते हैं । वैसे भारत विविधताओं का देश है यहां के लिए कहा जाता है 2 कोस में बदले पानी और 4 कोस में बदले वाणी ।

जितिया पर्व से जुड़ी पौराणिक कथा

महाभारत से जुड़ी कथा

जितिया व्रत की ​कथा महाभारत से जुड़ी है। महाभारत के युद्ध के दौरान द्रोणाचार्य अर्जुन द्वारा युद्ध में मारे गए थे। द्रोणाचार्य के पुत्र का नाम अश्वत्थामा था। अश्वत्थामा अपने पिता के मौत से बहुत गुस्से में था। इस कारण अश्वत्थामा ने बदले की भावना से अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ में पल रहे पुत्र को मारने के लिए ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया। उत्तरा के पुत्र का जन्म लेना जरुरी था।

तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपने सभी पुण्यों के फल से उस बच्चे को गर्भ में ही दोबारा जीवन दिया। गर्भ में मृत्यु को प्राप्त कर पुन: जीवन मिलने के कारण उसका नाम जीवित पुत्रिका रखा गया। वह बालक बाद में राजा परीक्षित के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस कायरतापूर्ण कार्य के लिए भगवान श्री कृष्ण ने अश्वत्थामा को श्राप दिया था कि वह अत्यंत कष्ट में जियेगा परंतु मौत नहीं आएगी, उन्होंने अश्वत्थामा को अमर कर दिया। कहा जाता है अश्वत्थामा आज भी जिंदा है और अत्यंत कष्ट में जीवन यापन कर रहा है । तब से लेकर आज तक जितिया पर्व मनाने की परंपरा चली आ रही ।

चील और सियार की कथा

इस कथा के अनुसार नर्मदा नदी के किनारे कंचनबटी नाम का एक नगर था । कंचनबटी नगर में एक मरूभूमि थी जिसमें एक पीपल का पेड़ था। उस पीपल के पेड़ में एक चील रहती थी और उसी पेड़ के नीचे एक सियार भी रहती थी। दोनों पक्की सहेलियां थी । दोनों सहेलियों ने देखा की कंचनबटी नगर में महिलाएं जितिया पर्व करती हैं । उन महिलाओं को देखकर दोनों ने जितिया पर्व मनाने का फैसला किया । दोनों ने भगवान जिउतवाहन का पूजन एवं व्रत करने का संकल्प लिया ।

उसी दिन उस नगर में एक बड़े व्यापारी की मौत हो गई । व्यापारी के दाह संस्कार के लिए उसे मरुस्थल लाया गया । व्यापारी के शव को देखकर सियारन के मन में लालच आ गया और उसने व्रत तोड़कर शव को खा लिया । परंतु चील ने संयम बनाये रखा और व्रत को पूरा किया । बाद में चील और सियारन की मौत हो गयी और अगले जन्म में दोनों ने भास्कर नाम के ब्राह्मण के घर में जन्म लिया।

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चील, बड़ी बहन बनी और उसका नाम शीलवती रखा गया। शीलवती की शादी बुद्धिसेन के साथ हुई। वहीं सिया‍रन, छोटी बहन के रूप में जन्‍मी और उसका नाम कपुरावती रखा गया। उसका विवाह उस नगर के राजा मलायकेतु से हुई। इस तरह कपुरावती कंचनबटी नगर की रानी बन गयी। भगवान जिउतवाहन के आशीर्वाद से शीलवती को सात बेटे हुए। वही दूसरी और कपुरवती के पिछले जन्म के कर्म के कारण बेटे जन्म लेते ही मर जाते थे। समय बीतने के साथ शीलवती के सातो बेटे बड़े हो गए। अच्छे व्यवहार के कारण राजा मलयकेतु ने सातो भाईयों को अपने दरबार में काम पर रख लिया।

छोटी बहन कपुरावती को इससे बहुत ईर्ष्या हुई। उसने अपने सैनिकों को आदेश दिया की सातों भाईयों का सर काटकर शीलवती को पहुँचा दे। सैनिकों ने सातों भाईयों का सर काट दिया और सभी के सर को थाली में सजाकर शीलवती को देने चले गए। परन्तु शीलवती के ऊपर भगवान जिउतवाहन का आशीर्वाद था। भगवान जिउतवाहन ने सातों भाइयों को मिट्टी का सर लगा दिया और अमृत छिड़ककर जीवित कर दिया। उधर सैनिकों के थाली के सर फल में बदल गए।

काफी देर बीतने के बाद जब कपुरावती को पता चला की सातों भाई जिन्दा हैं तो उसे काफी आश्चर्य हुआ। फिर भगवान जिउतवाहन की कृपा से उसे पिछले जन्म की सारी बातें याद आ गई। उसे अपने किये पर बहुत पछतावा हुआ। उसने भगवान से माफ़ी माँगी और कहा कि वह पूरी श्रद्धा से जितिया व्रत का पालन करेगी। भगवान जिउतवाहन ने कपुरावती को माफ़ कर दिया।

गरुड़ तथा नाग की कथा

गरुड़ और महात्मा जितमूतवाहन
गरुड़ और महात्मा जितमूतवाहन

गन्धर्वराज जीमूतवाहन बड़े धर्मात्मा और त्यागी पुरुष थे। युवाकाल में ही राजपाट छोड़कर वन में पिता की सेवा करने चले गए थे। एक दिन वे भ्रमण कर रहे थे तभी उन्हें नागमाता मिली,जो रो रही थी। महात्माजीमूतवाहन ने उनके विलाप करने का कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि नागवंश गरुड़ से काफी परेशान है। वह नागों को मारकर खा जाता है। वंश की रक्षा करने के लिए नागों ने गरुड़ से समझौता किया है कि वे प्रतिदिन उसे एक नाग खाने के लिए देंगे और इसके बदले वो हमारा सामूहिक शिकार नहीं करेगा। इस प्रक्रिया में आज उसके पुत्र को गरुड़ के सामने जाना है।

नागमाता की पूरी बात सुनकर जीमूतवाहन ने उन्हें वचन दिया कि वे उनके पुत्र को कुछ नहीं होने देंगे। इसके बाद महात्मा जीमूतवाहन कपड़े में लिपटकर खुद गरुड़ के सामने उस शिला पर लेट गए , जहां से गरुड़ अपना आहार उठाता था। गरुड़ ने जीमूतवाहन को अपने पंजों में दबाया और पहाड़ की तरफ उड़ गया । परन्तु उसे पता नहीं था कि उसने नाग की जगह महात्मा को पंजे से दबाया है। थोड़ी देर बाद जब गरुड़ ने देखा कि हमेशा रोने चिल्लाने वाला नाग आज शांत है, तो उसे शंका हुई । वह नीचे उतरा और कपड़ा हटाया तो महात्मा जीमूतवाहन को पाया।

महात्मा जीमूतवाहन को देखकर वह डर गया। तब महात्मा ने उसे ज्ञान दिया और कहा कि वह नागों को खाना छोड़ दे। गरुड़ ने महात्मा को यह वचन दिया की वह आगे से नागों को नहीं खायेगा।

जितिया पर्व का शुभ समय

जितिया व्रत इस वर्ष 10 सितंबर को पड़ रहा है। 9 सितम्बर को नहाय खाय है। 9 सितम्बर को रात्रि 9 बजकर 54 मिनट तक सप्तमी है। अष्टमी का शुभ मुहूर्त 9 सितम्बर रात्रि 9 बजकर 55 मिनट से शुरू हो जायेगा जो 10 सितम्बर को रात्रि 10 बजकर 57 मिनट तक रहेगा । अगले दिन यानि 11 सितंबर को इस व्रत को पारण के द्वारा तोड़ा जाएगा ।

नोनी साग, मरुआ की रोटी तथा मछली खाने की परंपरा

इस व्रत में नोनी का साग खाने की परंपरा है।

इसका वैज्ञानिक कारण भी है ।

नोनी में केल्शियम और आयरन प्रचुर मात्रा में होता है।

ऐसे में इसे लंबे उपवास से पहले खाने से खून का संचार ठीक से होता है जो उपवास रखने में सहायता करता है इससे पाचन भी ठीक रहता है।

इसलिए नहाय-खाय के दिन ही नोनी का साग खाया जाता है।

ठीक उसी प्रकार गेहूँ की रोटी की तुलना में मरुआ के रोटी में काफी मात्रा में विटामिन तथा मिनिरल्स होते हैं जो उपवास के दौरान शरीर में ऊर्जा बनाये रखता है।

मछली में प्रोटीन काफी मात्रा में होता है जो उपवास के दौरान शरीर को ऊर्जा प्रदान करता है।

जितिया पर्व करने की विधि

संतान की मंगल कामना व उसकी लंबी उम्र के लिए ये व्रत रखा जाता है।

यह निर्जला व्रत होता है। इसमें उपवास तीन दिन तक चलता है।

जीवित्पुत्रिका व्रत आश्विन मास की अष्टमी को रखा जाता है।

सप्तमी से जीवित्पुत्रिका व्रत की शुरुआत होती है।

इस दिन नहाय-खाय की पूरी प्रक्रिया पूरी की जाती है।

इसमें महिलाएं सुबह उठकर नदी या पोखर में नहाती हैं एवं पूजा पाठ करती हैं।

इस दिन बिना लहसुन प्याज के झींगा की सब्जी, कद्दू की सब्जी ,मरुआ के आटे की रोटी, नोनी का साग, खीरा आदि खाया जाता है ।

खाने से पहले भगवान जिउतवाहन को झींगा के पत्ते में भोजन दिया जाता है ।

अष्टमी को निर्जला उपवास रखना होता है।

व्रत का पारण नवमी के दिन किया जाता है।

वहीं अष्टमी को शाम में संतानशुदा स्त्रियां माता जीवित्पुत्रिका और जीमूतवाहन की पूजा करती हैं और व्रत कथा सुनती या पढ़ती है।

इसके साथ ही अपनी श्रद्धा व सामर्थ्य के अनुसार दान-दक्षिणा भी दी जाती है।

इस व्रत में सूर्योदय से पहले खाया पिया जाता है।

सूर्योदय के बाद पानी भी नहीं पिया जाता है।

इसके साथ ही सूर्योदय को अर्द्ध देने के बाद कुछ खाया या पिया जाता है।

जितिया व्रत का वैज्ञानिक महत्व

इस व्रत का वैज्ञानिक महत्व भी है।

वैज्ञानिकों के अनुसार मनुष्य को निर्जला व्रत करना चाहिए इससे शरीर के विकार बाहर निकल जाते हैं।

निर्जला व्रत का प्रचलन अब पश्चिमी देशों में भी काफी बढ़ रहा है।

निर्जला व्रत करने से शरीर में बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल आदि कंट्रोल में आ जाता है।

इससे ह्रदय, लिवर, किडनी इत्यादि शरीर के अंग स्वस्थ बनते हैं।

सारांश

जितिया व्रत अश्विन माह में कृष्ण पक्ष के अष्टमी को किया जाता है।

यह तीन दिनों का व्रत है ।

पहले दिन नदी या पोखर में स्नान करके पूजा पाठ की जाती है।

दूसरे दिन निर्जला उपवास रहता है।

तीसरे दिन पारण होता है।

यह पर्व मुख्यतः उत्तर भारत में मनाया जाता है।

यह उत्तर भारत के प्रमुख पर्वों में से एक है।

इसे लगभग सभी जाति के लोग मनाते हैं।

इस पर्व को बड़ी धूम धाम से मनाया जाता है।

संतान के दीर्घायु तथा अच्छे स्वास्थ्य के लिए यह व्रत किया जाता है।

यह निर्जला व्रत है इसमें पानी तक नहीं पिया जाता है।

इस व्रत को मनाने के पीछे वैज्ञानिक कारण भी हैं।

जितिया व्रत से जुड़ी महाभारत काल की पौराणिक कथा भी है।

इस पर्व में झींगा, साग, खीरा, मरुआ की रोटी, मछली आदि बनाया जाता है।

भगवान जिमूतवाहन की पूजा इस पर्व में की जाती है।

मुझे आशा है की आपको जितिया कब है पोस्ट पसंद आयी होगी।

मैंने इस पोस्ट के जरिये नयी जानकारियां देने की कोशिश की है ।

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